भारतीय रुपये के सामने इस समय एक कठिन परीक्षा है। रुपया लगातार 96.00 प्रति डॉलर के स्तर को छू रहा है लेकिन हर बार वह इस स्तर से ऊपर जाने में असफल रहा है। इस असफलता के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक की सक्रिय दखल साफ दिखाई दे रही है। जब भी रुपया कमजोर होकर इस स्तर को पार करने की कोशिश करता है तो केंद्रीय बैंक बाजार में उतरकर डॉलर की आपूर्ति बढ़ा देता है, जिससे रुपये को सहारा मिल जाता है। यह रणनीति बताती है कि रिजर्व बैंक रुपये को अनियंत्रित गिरने से बचाना चाहता है लेकिन वह इसे कृत्रिम रूप से बहुत मजबूत भी नहीं बनाना चाहता, क्योंकि बहुत मजबूत रुपया निर्यातकों के लिए नुकसानदेह होता है।
रुपये पर दबाव की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी बॉन्ड यील्ड है। अमेरिका के दस वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.18 से 5.20 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, जो उन्नीस वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर है। जब अमेरिकी बॉन्ड से इतना ऊंचा और सुरक्षित रिटर्न मिलता है तो विदेशी संस्थागत निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका ले जाना पसंद करते हैं। इस पूंजी निकासी का सीधा असर रुपये की कीमत पर पड़ता है। इसी कारण लगातार कई सत्रों से रुपया कमजोर बना हुआ है और रिजर्व बैंक को अपनी हस्तक्षेप की रणनीति जारी रखनी पड़ रही है।
इस दबाव का दूसरा बड़ा कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। भारत अपनी तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इसलिए तेल की कीमतें भारत के व्यापार घाटे को सीधे प्रभावित करती हैं। जब तेल महंगा होता है तो भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। ब्रेंट क्रूड हाल के कारोबार में सौ डॉलर के स्तर को पार कर गया था, जो भारत जैसे आयातक देश के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। ऊंची तेल कीमतों और बढ़ती अमेरिकी यील्ड ने मिलकर इंडोनेशियाई रुपिया, फिलीपीन पेसो, भारतीय रुपया और थाई बात जैसी एशियाई मुद्राओं को कमजोर बनाया है, क्योंकि इससे जोखिम लेने की क्षमता घट जाती है।
अमेरिकी डीजल बाजार में भी बड़ी हलचल है और यह भारत के लिए अहम है। अमेरिका में डीजल की खुदरा कीमतें छह डॉलर पचास सेंट प्रति गैलन से ऊपर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। व्हाइट हाउस ने डीजल निर्यात पर रोक लगाने की तैयारी की खबरों से इनकार किया है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि वे नवंबर के मध्यावधि चुनावों से पहले कीमतें कम करने के लिए डीजल निर्यात रोकने के रिपब्लिकन प्रस्तावों का समर्थन करेंगे और अमेरिकी ट्रेजरी ने कहा है कि इसकी समीक्षा चल रही है। अगर अमेरिका वास्तव में डीजल के निर्यात पर रोक लगाता है तो वैश्विक डीजल बाजार में आपूर्ति की कमी हो सकती है, जिससे कीमतें और बढ़ सकती हैं और भारत जैसे आयातक देशों पर असर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव भी तेज रहा है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट मंगलवार को ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के संकेत के बाद गिरकर 88.67 डॉलर तक आ गया था, लेकिन गुरुवार तक यह वापस 96.78 डॉलर पर पहुंच गया। हालांकि साप्ताहिक आधार पर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट में सात प्रतिशत की तेज गिरावट दर्ज हुई क्योंकि माल ढुलाई की लागत बढ़ने और डीजल बाजार की चिंताओं ने ब्रेंट और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट के बीच अंतर को लगभग बारह डॉलर तक चौड़ा कर दिया। ब्रेंट और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट के बीच इतना बड़ा अंतर असामान्य है और यह बताता है कि बाजार में आपूर्ति श्रृंखला को लेकर गहरी चिंता बनी हुई है। कुल मिलाकर तेल ने साप्ताहिक आधार पर लगभग दो प्रतिशत की मामूली बढ़त दर्ज की।
होर्मुज जलडमरूमध्य का मामला भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ईरान ने वाशिंगटन की शर्तों को स्वीकार करने के सात दिन के भीतर जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की पेशकश की है, लेकिन खाड़ी देशों ने जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण को साफ मना कर दिया है। ईरान शुल्क पर लचीलापन दिखा रहा है लेकिन नियंत्रण पर नहीं। रॉयटर्स के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच एक चरणबद्ध व्यवस्था पर बातचीत चल रही है जिसमें जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाए और अमेरिकी नाकाबंदी में ढील दी जाए, लेकिन दोनों पक्ष अपना दांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ईरान के राष्ट्रपति पेजेशकियान ने कहा है कि वे अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले समझौता चाहते हैं। इस अनिश्चितता का असर तेल की कीमतों पर और इसके जरिए भारतीय रुपये पर पड़ता रहेगा।
भारत सरकार ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कई कदम उठा रही है। बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार कम होने के कारण भारत आयातित कोयले के अनिवार्य मिश्रण पर विचार कर रहा है ताकि बिजली उत्पादन बाधित न हो। यह कदम बताता है कि ऊर्जा सुरक्षा इस समय भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन गई है और यह सीधे तौर पर देश के व्यापार घाटे और रुपये की स्थिति से जुड़ा हुआ है। ऊर्जा आयात पर बढ़ता खर्च देश के चालू खाते के घाटे को बढ़ाता है और इससे रुपये पर और दबाव आता है।
इसी तरह सऊदी अरामको ने हमलों के बाद बंद हुई अपनी ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन को दो सप्ताह से भी कम समय में फिर से शुरू कर दिया है। यह पाइपलाइन सात मिलियन बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाली प्रणाली थी और अब यह घटी हुई दर पर लगभग चार मिलियन बैरल प्रतिदिन पंप कर रही है। यह खबर वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए राहत भरी है और अगर यह पूरी क्षमता से चलने लगे तो तेल की कीमतों पर कुछ नरमी आ सकती है, जिससे भारत जैसे आयातक देशों को लाभ होगा।
रुपये की कमजोरी का असर आम भारतीय उपभोक्ता पर भी पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है तो आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। चूंकि भारत तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और कई अन्य वस्तुएं आयात करता है, इसलिए रुपये की गिरावट इन सभी की कीमतों में बढ़ोतरी कर देती है। इससे घरेलू महंगाई बढ़ती है और आम नागरिक की क्रय शक्ति घटती है। यही कारण है कि भारतीय रिजर्व बैंक रुपये के मूल्य को लेकर इतना सतर्क रहता है और बाजार में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है।
रिजर्व बैंक के सामने एक कठिन द्वंद्व है। अगर वह रुपये को बचाने के लिए बहुत अधिक डॉलर बेचता है तो उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। अगर वह रुपये को गिरने देता है तो महंगाई बढ़ती है। और अगर वह महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ाता है तो आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। इसलिए केंद्रीय बैंक को हर कदम सोच समझकर उठाना पड़ता है और वह आमतौर पर एक संतुलित रास्ता चुनता है जिसमें रुपये को पूरी तरह गिरने से रोका जाए लेकिन अत्यधिक सख्ती से विकास को नुकसान न पहुंचे।
विदेशी निवेशकों के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है। जब रुपया कमजोर होता है तो भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को डॉलर में कम रिटर्न मिलता है, भले ही रुपये में उनका निवेश बढ़ा हो। इससे विदेशी निवेश की गति प्रभावित हो सकती है। इसलिए रुपये की स्थिरता केवल एक मुद्रा का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय पूंजी बाजार की सेहत से जुड़ा हुआ है और इसी कारण निवेशक इसे इतनी बारीकी से देखते हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए इस समय कुछ बुनियादी बातें समझना जरूरी है। पहली बात यह है कि रुपये की चाल को अकेले नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे अमेरिकी यील्ड, डॉलर इंडेक्स और तेल की कीमतों के साथ मिलकर देखा जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि अगर अमेरिकी यील्ड ऊपर जाती रहती है तो रुपये पर दबाव बना रहेगा और रिजर्व बैंक को लगातार हस्तक्षेप करना पड़ेगा। तीसरी बात यह है कि अगर ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो जाता है और होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल जाता है तो तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे रुपये को बड़ी राहत मिलेगी।
हालांकि इस समय सबसे बड़ी अनिश्चितता अक्टूबर में होने वाली फेडरल रिजर्व की बैठक को लेकर है। बाजार 25 आधार अंक की एक और बढ़ोतरी की पर्याप्त संभावना तय कर रहा है और अगर ऐसा होता है तो डॉलर और मजबूत होगा, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ेगा। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी हस्तक्षेप की रणनीति को और सक्रिय करना पड़ सकता है। दूसरी ओर अगर फेडरल रिजर्व सख्ती में ढील देता है तो रुपये को राहत मिल सकती है और विदेशी निवेश की वापसी से भारतीय बाजार को सहारा मिल सकता है।
कुल मिलाकर भारत के सामने इस समय एक चुनौतीपूर्ण माहौल है। एक ओर ऊंची अमेरिकी यील्ड और मजबूत डॉलर के कारण पूंजी बाहर जा रही है और रुपया कमजोर हो रहा है, तो दूसरी ओर ऊंची तेल कीमतें महंगाई और व्यापार घाटे को बढ़ा रही हैं। इन दोनों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक को ऐसी राह चुननी है जिसमें न रुपये को अनियंत्रित गिरने दिया जाए और न विकास की गति थम जाए। यही कारण है कि इस समय रुपये की हर चाल, रिजर्व बैंक की हर दखल और हर तेल की कीमत का आंकड़ा बाजार के लिए बेहद मायने रखता है। इसे समझना हर उस निवेशक के लिए जरूरी है जो भारतीय बाजार में अपना पैसा लगाता है और अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखना चाहता है।