अमेरिकी डॉलर बनाम जापानी येन की जोड़ी इस समय वैश्विक मुद्रा बाजार का सबसे गर्म विषय बनी हुई है। डॉलर बनाम येन लगातार पांच सत्रों तक बढ़ता रहा और 158.83 के स्तर तक पहुंच गया। यह स्तर बाजार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ऊपर जाने पर जापानी अधिकारियों के हस्तक्षेप की संभावना तेजी से बढ़ जाती है। यूनाइटेड ओवरसीज बैंक जैसे बड़े संस्थानों ने चेतावनी दी है कि यह जोड़ी अत्यधिक खरीददारी वाली स्थिति में पहुंच चुकी है और दबाव 159.60 की ओर बढ़ सकता है। हालांकि बाद में सत्र में डॉलर बनाम येन 158.50 के नीचे फिसल गया, जो बताता है कि बाजार बहुत सतर्क है।
इस मुद्रा जोड़ी में इतनी तेजी की सबसे बड़ी वजह दोनों देशों की ब्याज दरों में भारी अंतर है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने दरों को 3.75 से 4.00 प्रतिशत के दायरे में बनाए रखा है और अक्टूबर की बैठक में एक और बढ़ोतरी की संभावना बाजार गंभीरता से तय कर रहा है। वहीं जापान का केंद्रीय बैंक लंबे समय से बेहद ढीली मौद्रिक नीति अपनाए हुए है। जब एक देश की दरें ऊंची हों और दूसरे की बहुत कम, तो निवेशक सस्ती मुद्रा में कर्ज लेकर महंगी मुद्रा में निवेश करते हैं और इससे येन कमजोर तथा डॉलर मजबूत होता है।
जापानी नेतृत्व भी इस स्थिति पर चिंता जता चुका है। जापान की ताकाइची ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कमजोर येन को लेकर चिंता व्यक्त की है। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि येन की कमजोरी अब केवल जापान का आंतरिक मामला नहीं रह गया है बल्कि यह अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन का भी मुद्दा बन चुका है। कमजोर येन जापानी निर्यात को सस्ता बनाता है, जिससे अमेरिकी निर्माताओं को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है और इसी वजह से अमेरिकी नीति निर्माता इसे लेकर चिंतित रहते हैं।
जापानी अधिकारियों के पास असली हथियार मौखिक चेतावनी और बाजार में सीधा हस्तक्षेप है। जब येन बहुत तेजी से कमजोर होता है तो जापान का वित्त मंत्रालय बाजार में उतरकर येन खरीदता है और डॉलर बेचता है, जिससे येन की कीमत अचानक बढ़ जाती है। इस तरह के हस्तक्षेप का असर बहुत तेज होता है और जो निवेशक येन की कमजोरी पर दांव लगाए बैठे होते हैं उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि जब भी येन 158 से ऊपर जाता है तो पूरा बाजार सतर्क हो जाता है और कुछ निवेशक अपना मुनाफा वसूल करने लगते हैं, जैसा कि हाल के सत्र में देखा गया।
डॉलर बनाम येन की तेजी पर अंकुश लगाने का दूसरा कारण ऊंची अमेरिकी यील्ड है। जब दस वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.18 से 5.20 प्रतिशत के आसपास बनी रहती है तो अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करना जापानी निवेशकों के लिए भी आकर्षक हो जाता है, क्योंकि जापान में ब्याज दरें बहुत कम हैं। इससे अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ती है और येन पर दबाव आता है। लेकिन ऊंची यील्ड एक तलवार की तरह दोनों तरफ काटती है। अगर अमेरिकी बाजार में अचानक उतार चढ़ाव आता है और निवेशक अपने जोखिम वाले दांव बंद करने लगते हैं तो वे अपना पैसा जापान लौटाने लगते हैं, जिससे येन अचानक मजबूत हो सकता है। यही वजह है कि इस जोड़ी में उतार चढ़ाव अचानक हो सकता है।
इस जोड़ी के बाद बाजार की नजर चीनी युआन पर जाती है। अमेरिकी डॉलर बनाम ऑफशोर चीनी युआन 6.7200 के स्तर पर जाने के बाद स्थिर हो रहा है और विश्लेषकों का मानना है कि इसमें 6.7330 की ओर जाने का जोखिम बना हुआ है। चीन का केंद्रीय बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना युआन को मोटे तौर पर स्थिर बनाए हुए है। चीन के लिए स्थिर युआन एक नीतिगत प्राथमिकता है क्योंकि इससे निर्यात को सहारा मिलता है और बाजार में भरोसा बना रहता है। इसलिए पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना हर उस कदम को अंजाम देता है जिससे युआन की कीमत नियंत्रण में रहे।
चीन और अमेरिका के बीच व्यापार और भू राजनीतिक संबंध भी युआन की चाल को प्रभावित करते हैं। व्हाइट हाउस में हुई ट्रंप और शी की बैठक में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध विराम दो महीने के लिए बढ़ा दिया गया, लेकिन कोई नई टैरिफ कटौती नहीं हुई और कोई कृत्रिम बुद्धिमत्ता संवाद तंत्र भी स्थापित नहीं हुआ। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के बीच व्यापार विवाद पूरी तरह हल नहीं हुआ है बल्कि टाल दिया गया है। दस जनवरी की समय सीमा अब व्यापार के प्रति संवेदनशील परिसंपत्तियों के लिए अगली बड़ी जोखिम घटना बन गई है। ट्रंप नवंबर में शी से फिर मुलाकात करेंगे, जिससे बाजार को कुछ उम्मीद बनी हुई है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय के ग्रीर ने कहा है कि अमेरिका और चीन उन वस्तुओं के एक उपसमूह पर सहमति पर पहुंचे हैं जिनका वे आपस में व्यापार कर सकते हैं। यह सीमित प्रगति है लेकिन इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। व्यापार समझौते की किसी भी खबर से युआन मजबूत होता है जबकि तनाव बढ़ने की खबर से युआन कमजोर होता है। इसलिए चीनी युआन की चाल को समझने के लिए केवल आर्थिक आंकड़े नहीं बल्कि राजनीतिक घटनाक्रम पर भी नजर रखनी पड़ती है।
चीन में इस समय छुट्टियों का मौसम है। मध्य शरद उत्सव के कारण चीन के बाजार बंद हैं और इसके बाद राष्ट्रीय दिवस के सप्ताह भर के अवकाश का दौर आएगा। चीनी बाजार बंद होने से ऑनशोर युआन की कीमत खोज प्रभावित होती है और लौह अयस्क जैसी वस्तुओं की कीमत का निर्धारण सिंगापुर जैसे बाजारों की ओर खिसक जाता है। यह बदलाव बताता है कि एशियाई बाजारों की आपसी निर्भरता कितनी गहरी है और चीन की छुट्टियों का असर पूरे क्षेत्र पर कैसे पड़ता है। इस अवधि में तरलता कम रहती है जिससे कीमतों में अचानक उतार चढ़ाव की संभावना बढ़ जाती है।
कोरियाई वॉन की चाल भी इसी क्षेत्रीय तस्वीर का हिस्सा है। डॉलर बनाम कोरियाई वॉन लगभग 1390 के स्तर से फिसलकर 1360 तक आ गया क्योंकि कोरियाई निर्यातकों ने चुसेओक त्योहार से पहले डॉलर बेचे। विश्लेषकों का मानना है कि कोरिया का व्यापार अधिशेष तकनीक और सेमीकंडक्टर निर्यात के दम पर और बढ़ेगा। यह बताता है कि एशियाई मुद्राओं की चाल उनके निर्यात और व्यापार संतुलन से गहराई से जुड़ी हुई है और इसी वजह से एक मुद्रा की चाल का असर दूसरी पर भी पड़ता है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर भी इसी कहानी का हिस्सा है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर लगभग 0.7025 पर कारोबार कर रहा है और यह 0.7000 से वापसी कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया का केंद्रीय बैंक 25 आधार अंक की बढ़ोतरी कर सकता है क्योंकि अर्थव्यवस्था गर्म बनी हुई है, श्रम बाजार तंग है और जीडीपी तथा महंगाई के आंकड़ों में ऊपर की ओर आश्चर्य दिख रहे हैं। लेकिन चीन की छुट्टियों के कारण ऑनशोर आधार खत्म हो गया है, इसलिए लौह अयस्क की कीमत का निर्धारण सिंगapore में हो रहा है।
अमेरिकी डॉलर बनाम स्विस फ्रैंक भी लगातार चौथे सप्ताह बढ़त की ओर है और लगभग 0.8285 पर कारोबार कर रहा है, हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि अत्यधिक खरीददारी की स्थिति के कारण इसकी बढ़त 0.8305 से 0.8330 के बीच सीमित हो सकती है। पाउंड बनाम डॉलर शुक्रवार को 0.18 प्रतिशत से अधिक बढ़ा क्योंकि डॉलर में कुछ ठहराव आया और इससे साप्ताहिक गिरावट कम हुई। हालांकि ब्रिटेन में महंगाई का जोखिम बना हुआ है।
भारतीय निवेशकों के लिए इन सभी मुद्राओं की चाल एक महत्वपूर्ण सबक देती है। वैश्विक मुद्रा बाजार आपस में जुड़ा हुआ है और किसी एक जोड़ी में होने वाली हलचल दूसरी जोड़ी पर भी असर डालती है। डॉलर बनाम येन की तेजी, युआन की स्थिरता और एशियाई मुद्राओं की कमजोरी ये सब एक ही बड़ी कहानी के अलग अलग हिस्से हैं जिसका केंद्र बिंदु अमेरिकी ब्याज दरें और डॉलर की मजबूती है। इसलिए भारतीय निवेशकों को रुपये की चाल को अलग थलग नहीं देखना चाहिए बल्कि उसे इस पूरे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए।
आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण घटनाएं जापान का संभावित हस्तक्षेप, फेडरल रिजर्व की अक्टूबर बैठक और अमेरिका चीन व्यापार वार्ता की प्रगति होंगी। अगर जापान बाजार में हस्तक्षेप करता है तो डॉलर बनाम येन में अचानक भारी गिरावट आ सकती है। अगर फेडरल रिजर्व दरें बढ़ाता है तो डॉलर को और बल मिलेगा और एशियाई मुद्राओं पर दबाव बढ़ेगा। और अगर अमेरिका चीन व्यापार समझौते में प्रगति होती है तो युआन सहित एशियाई मुद्राओं को राहत मिल सकती है।
कुल मिलाकर एशियाई मुद्रा बाजार इस समय अत्यधिक सतर्क माहौल में कारोबार कर रहा है। एक ओर डॉलर की मजबूती और ऊंची अमेरिकी यील्ड मुद्राओं को दबा रही है, तो दूसरी ओर जापान और चीन जैसे देशों के केंद्रीय बैंक अपनी मुद्राओं को स्थिर रखने के लिए सक्रिय कदम उठा रहे हैं। इन दोनों ताकतों के बीच आने वाले हफ्तों में भारी उतार चढ़ाव की संभावना है। ऐसे माहौल में निवेशकों के लिए सबसे समझदार रणनीति यही है कि वे अपने जोखिम को नियंत्रित रखें, बहुत बड़े दांव से बचें और बाजार की हर नई जानकारी पर अपनी रणनीति को लचीले ढंग से ढालते रहें। मुद्रा बाजार में धैर्य और अनुशासन ही सबसे बड़ी पूंजी है।