सोने की कीमतों ने इस सप्ताह निवेशकों को निराश किया है। दो दिन की गिरावट के बाद शुक्रवार को स्पॉट गोल्ड में कुछ स्थिरता दिखी, लेकिन सोना 4300 डॉलर के नीचे ही संघर्ष करता रहा और साप्ताहिक आधार पर वह गिरावट की ओर बढ़ रहा था। इससे पहले धातु लगभग 4290 डॉलर के आसपास कारोबार कर रही थी, जो अगस्त में बने लगभग 4700 डॉलर के उच्चतम स्तर से काफी नीचे है। यह गिरावट किसी अचानक घटना की वजह से नहीं हुई, बल्कि इसका कारण बहुत बुनियादी है और वह है फेडरल रिजर्व का सख्त रुख।
सोने की कीमत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच गहरा उल्टा संबंध होता है। जब दस वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.18 से 5.20 प्रतिशत के स्तर पर टिकी रहती है, जो उन्नीस वर्षों का सर्वोच्च स्तर है, तो सोना रखने की अवसर लागत बहुत बढ़ जाती है। सोने में निवेश करने वाला निवेशक यह सोचने लगता है कि अगर सरकारी बॉन्ड से ही इतना अच्छा और सुरक्षित रिटर्न मिल रहा है तो सोना क्यों रखें जिसमें न ब्याज मिलता है और न कोई डिविडेंड। यही सोच इस समय बाजार पर हावी है और इसी कारण सोना 4300 डॉलर के नीचे फंसा हुआ है।
इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेना उपयोगी होगा। मान लीजिए किसी निवेशक के पास दस लाख रुपये हैं। अगर वह यह पैसा अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में लगाता है तो उसे लगभग पांच प्रतिशत सालाना ब्याज मिलेगा और उसका पैसा बहुत सुरक्षित रहेगा। लेकिन अगर वह वही पैसा सोने में लगाता है तो उसे कोई ब्याज नहीं मिलेगा और कीमत ऊपर नीचे होने का जोखिम भी रहेगा। जब ब्याज दरें इतनी ऊंची हों तो स्वाभाविक रूप से निवेशक बॉन्ड की ओर झुकते हैं। यही असली ब्याज दर का सिद्धांत है, जो मुद्रास्फीति को घटाने के बाद बची हुई ब्याज दर को दर्शाता है और सोने की कीमत का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है।
लेकिन सोने की कहानी केवल चक्रीय दबाव की नहीं है। इसके पीछे एक संरचनात्मक मांग भी खड़ी है जो बहुत मजबूत बनी हुई है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स में भी निवेशकों का पैसा आ रहा है। यह दोहरा सहारा सोने की कीमत को बहुत नीचे गिरने से बचाता है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में सोना इसलिए बढ़ा रहे हैं क्योंकि वे विदेशी मुद्रा भंडार पर अपनी निर्भरता घटाना चाहते हैं और भू राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में एक ऐसी परिसंपत्ति रखना चाहते हैं जिस पर किसी दूसरे देश का नियंत्रण न हो। इसलिए सोने के बाजार में एक ऐसी खींचतान चल रही है जिसमें चक्रीय दबाव नीचे खींच रहा है और संरचनात्मक मांग ऊपर थामे हुए है।
चांदी की स्थिति सोने से भी नाजुक है। चांदी लगभग 64.30 डॉलर के स्तर पर सपाट कारोबार कर रही है और यह भी साप्ताहिक गिरावट की राह पर है। तकनीकी संकेतक इस समय चांदी के लिए कमजोर गति दिखा रहे हैं। आरएसआई और एडीएक्स जैसे संकेतक बताते हैं कि कीमत में कोई ठोस तेजी की ताकत नहीं है और बाजार दिशा तय करने के लिए संघर्ष कर रहा है। चांदी का विशेष महत्व इस बात में है कि यह केवल एक मूल्यवान धातु नहीं है बल्कि औद्योगिक उत्पादन की भी महत्वपूर्ण कच्ची सामग्री है।
सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहनों में चांदी का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। सौर ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकी के विस्तार के साथ चांदी की औद्योगिक मांग बढ़ती रही है, लेकिन अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है या ऊर्जा की ऊंची कीमतें उत्पादन लागत बढ़ाती हैं तो यह मांग प्रभावित होती है। इसलिए चांदी की कीमत दो अलग अलग ताकतों से तय होती है, एक निवेश की मांग और दूसरी उद्योग की मांग। जब दोनों एक साथ कमजोर पड़ जाएं तो चांदी पर दोहरा दबाव बन जाता है और यही इस समय हो रहा है।
भारतीय निवेशकों के लिए यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े चांदी उपभोक्ता देशों में से एक है। यहां चांदी की मांग दो मकसदों से होती है, पहला आभूषण और दूसरा निवेश। शादी विवाह के मौसम में चांदी की मांग बढ़ती है और निवेशक भी सोने के साथ चांदी खरीदते हैं। इसलिए वैश्विक यील्ड और डॉलर की चाल का असर भारतीय चांदी बाजार की कीमतों पर सीधे दिखता है। जब डॉलर मजबूत होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत घटती है, लेकिन अगर रुपया भी कमजोर हो रहा है तो भारतीय बाजार में चांदी की कीमत उतनी नहीं घटती क्योंकि रुपये में गिरावट उस गिरावट की भरपाई कर देती है।
भू राजनीतिक घटनाक्रम भी धातुओं की कीमत को प्रभावित करते हैं। जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का प्रस्ताव रखा और वाशिंगटन की शर्तों को स्वीकार करने के सात दिन के भीतर ऐसा करने की बात कही तो बाजार में तनाव कुछ कम हुआ और सुरक्षित निवेश की मांग भी थोड़ी घटी। हालांकि खाड़ी देशों ने जलडमरूमध्य पर ईरानी नियंत्रण को साफ मना कर दिया है और ईरान शुल्क पर लचीलापन दिखा रहा है लेकिन नियंत्रण पर नहीं। दोनों पक्ष अपना दांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं इसलिए यह मामला पूरी तरह हल नहीं हुआ है। ऐसे माहौल में सोना अपनी सुरक्षित निवेश वाली भूमिका बनाए रखता है और किसी भी बड़ी घटना पर उसकी चमक लौट सकती है।
इसी तरह डॉलर की मजबूती भी धातुओं के लिए एक और बाधा है। चूंकि सोना और चांदी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में कीमत पाते हैं इसलिए जब डॉलर मजबूत होता है तो दूसरी मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए ये धातुएं महंगी हो जाती हैं और उनकी मांग घट जाती है। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स की मजबूती और ऊंची यील्ड की जोड़ी इस समय धातुओं के लिए दोहरी मार का काम कर रही है। यह समझना जरूरी है कि ऊंची यील्ड का असर सभी परिसंपत्तियों पर एक जैसा नहीं होता। बॉन्ड निवेशकों के लिए ऊंची यील्ड वरदान है क्योंकि उन्हें सुरक्षित आय अधिक मिलती है, लेकिन सोने और चांदी के निवेशकों के लिए यह चुनौती है क्योंकि उनकी परिसंपत्ति को प्रतिस्पर्धा में पीछे रहना पड़ता है।
सोने और चांदी के निवेशकों के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि फेडरल रिजर्व अपनी सख्त राह कब तक जारी रखेगा। अक्टूबर की बैठक में एक और बढ़ोतरी की संभावना को बाजार गंभीरता से ले रहा है और अगर ऐसा होता है तो धातुओं पर दबाव और बढ़ सकता है। वहीं अगर महंगाई में अचानक नरमी दिखती है या अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत आते हैं तो यील्ड गिर सकती है और धातुएं तेजी से वापसी कर सकती हैं। यानी आने वाले हफ्तों में सोना और चांदी दोनों के लिए उतार चढ़ाव भरा माहौल बना रहेगा और निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है।
लंबी अवधि में देखें तो सोने की मूल कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स में आ रहा पैसा बताता है कि बाजार में सोने के प्रति एक स्थायी विश्वास बना हुआ है। जब भी चक्रीय दबाव कम होगा यही संरचनात्मक मांग सोने को फिर से ऊपर ले जाने में सहायक होगी। इसलिए जो निवेशक लंबी अवधि के लिए सोना खरीद रहे हैं उनके लिए अभी की गिरावट एक अवसर भी हो सकती है, बशर्ते वे जोखिम को समझते हुए और धैर्य के साथ निवेश करें। कीमती धातुओं का बाजार हमेशा धैर्यवान निवेशकों को ही इनाम देता है।
इस बीच चांदी के निवेशकों को यह भी देखना चाहिए कि औद्योगिक मांग कब लौटती है। अगर वैश्विक विनिर्माण गतिविधि में सुधार दिखता है और सौर ऊर्जा तथा इलेक्ट्रिक वाहन क्षेत्र का विस्तार जारी रहता है तो चांदी को सोने से अधिक सहारा मिल सकता है। लेकिन अगर ऊंची ऊर्जा लागत और महंगाई उद्योग जगत की रफ्तार धीमी करती है तो चांदी लंबे समय तक कमजोर बनी रह सकती है। इसलिए चांदी में निवेश करने वालों को सोने की तुलना में अधिक सतर्कता और निगरानी की आवश्यकता होती है।
कुल मिलाकर इस समय सोना और चांदी दोनों एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। ऊंची अमेरिकी यील्ड, मजबूत डॉलर और फेडरल रिजर्व का सख्त रुख मिलकर इन पर दबाव बना रहे हैं, जिसके कारण सोना 4300 डॉलर के नीचे और चांदी 64.30 डॉलर के आसपास फंसी हुई है। लेकिन केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और भू राजनीतिक अनिश्चितता धातुओं को एक मजबूत सहारा भी दे रही है। ऐसे में अगले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि बाजार चक्रीय दबाव के आगे झुकता है या संरचनात्मक मांग के दम पर वापसी करता है। दोनों संभावनाओं के लिए तैयार रहना ही समझदारी है।