अमेरिकी बॉन्ड बाजार में इस समय जो हो रहा है, वह दुनिया भर के निवेशकों के लिए सबसे बड़ा संकेत बन चुका है। अमेरिका के दस वर्षीय ट्रेजरी यील्ड हाल के कारोबार में 5.18 से 5.20 प्रतिशत के दायरे में टिका हुआ है, जबकि इसने पहले 5.228 प्रतिशत का उच्चतम स्तर छुआ था, जो उन्नीस वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर है। तीस वर्षीय यील्ड भी बाईस वर्षों के शिखर पर पहुंच चुकी है और तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार अगली बड़ी बाधा 5.25 से 5.30 प्रतिशत के बीच है। जब यील्ड इतनी ऊंची हो जाती है, तो वह केवल एक आंकड़ा नहीं रह जाती। यह पूरे वैश्विक पूंजी प्रवाह की दिशा तय करने लगती है और उभरते बाजारों से पैसा निकलकर अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर लौटने लगता है।
इस ऊंची यील्ड का एक बड़ा कारण यह है कि अमेरिकी ट्रेजरी को अपना कर्ज बेचने के लिए अधिक ब्याज देना पड़ रहा है। हाल ही में सात वर्षीय नोट्स की 44 अरब डॉलर की नीलामी 5.085 प्रतिशत की उच्च यील्ड पर हुई, जबकि नीलामी से पहले का संकेत 5.078 प्रतिशत था। यानी 0.7 आधार अंक की टेल बनी, जबकि औसत टेल केवल 0.2 आधार अंक रहती है। बिड टू कवर अनुपात 2.42 गुना रहा, जो औसत 2.49 गुना से कम है, और अप्रत्यक्ष खरीदारों का हिस्सा 57.2 प्रतिशत रहा, जो सामान्य 64.6 प्रतिशत से साफ कम है। इन आंकड़ों का मतलब सीधा है कि निवेशक अमेरिकी सरकार को कर्ज देने के लिए अब अधिक मुनाफा मांग रहे हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के भीतर सख्त रुख भी साफ दिख रहा है। क्लीवलैंड फेड की अध्यक्ष बेथ हैमैक ने कहा है कि मौद्रिक नीति अभी भी प्रतिबंधात्मक नहीं है और सबसे बड़ा महंगाई जोखिम मुद्रास्फीति की मानसिकता बनने में है। यह भाषा बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका मतलब यह है कि फेडरल रिजर्व दरों को और ऊंचा रखने को तैयार है। फेडरल रिजर्व ने सितंबर में दरों को 25 आधार अंक बढ़ाकर 3.75 से 4.00 प्रतिशत के दायरे में कर दिया था और अब अक्टूबर की बैठक में एक और समान बढ़ोतरी की संभावना बाजार गंभीरता से तय कर रहा है।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक के उपाध्यक्ष बोरिस वुज्चिच ने भी स्वीकार किया कि ईसीबी ने कसावट का दौर शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहने का जोखिम है और डीजल की कीमतें भी अच्छे खासे समय तक ऊंची रहेंगी। जब दुनिया के दो सबसे बड़े केंद्रीय बैंक एक साथ सख्ती की ओर इशारा करते हैं तो डॉलर को स्वाभाविक बढ़त मिलती है क्योंकि निवेशक यह अनुमान लगाते हैं कि अमेरिकी ब्याज दरें सबसे ऊंची बनी रहेंगी।
अमेरिकी आर्थिक आंकड़े भी डॉलर का पक्ष ले रहे हैं। अगस्त में टिकाऊ वस्तुओं के ऑर्डर 0.0 प्रतिशत रहे, जबकि 0.4 प्रतिशत की गिरावट की अपेक्षा थी। रक्षा और विमान को छोड़कर पूंजीगत वस्तुओं के ऑर्डर 1.6 प्रतिशत बढ़े, जबकि अपेक्षा केवल 0.5 प्रतिशत की थी, जो बताता है कि अमेरिकी कंपनियां निवेश करने से नहीं डर रही हैं। अगस्त में नए घरों की बिक्री 0.684 मिलियन रही, जबकि अपेक्षा 0.615 मिलियन की थी और जुलाई का आंकड़ा संशोधित होकर 0.643 मिलियन हो गया। अंतिम सितंबर मिशिगन उपभोक्ता भावना सूचकांक भी 48.1 पर आया, जो 47.6 की अपेक्षा से बेहतर है।
रोजगार बाजार भी अभी टूटता नहीं दिख रहा। अमेरिका में साप्ताहिक बेरोजगारी दावे 197 हजार रहे, जबकि अपेक्षा 201 हजार की थी, और निरंतर दावे 1719 हजार रहे, जबकि अपेक्षा 1745 हजार की थी। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का अमेरिकी मंदी संकेतक भी हाल में एक चेतावनी संकेत दे चुका है, लेकिन उपभोक्ता खर्च में टूटन का कोई साफ संकेत नहीं दिख रहा और ऑक्सफोर्ड स्वयं इस संकेत को कम महत्व दे रहा है। कनाडा के खुदरा आंकड़े भी मिलेजुले रहे। जुलाई में खुदरा बिक्री -0.7 प्रतिशत रही, जो -0.8 प्रतिशत की अपेक्षा थोड़ी बेहतर थी, और अगस्त का अग्रिम अनुमान 1.3 प्रतिशत की बढ़त दिखा रहा है। स्पेन की दूसरी तिमाही की जीडीपी वृद्धि भी 0.7 प्रतिशत तिमाही दर पर पुष्ट हुई, जो पिछले 0.6 प्रतिशत से बेहतर है।
इन सब आंकड़ों का मिलाजुला असर डॉलर इंडेक्स पर साफ दिख रहा है। मजबूत आर्थिक गतिविधि, ऊंची यील्ड और सख्त केंद्रीय बैंक का संयोजन डॉलर को एक ऐसा आश्रय बना देता है जहां वैश्विक निवेशक अपना पैसा सुरक्षित रखना चाहते हैं। जब भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक डॉलर जैसी सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर भागते हैं और यही डॉलर इंडेक्स को ऊपर धकेलता है। भारतीय निवेशकों के लिए इसका मतलब यह है कि जब तक अमेरिकी यील्ड पांच प्रतिशत से ऊपर रहती है, तब तक रुपये पर दबाव बना रहेगा, क्योंकि विदेशी संस्थागत निवेशक भारत जैसे बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड में लगाना अधिक लाभदायक समझते हैं।
यूरो की स्थिति भी इस तस्वीर को पूरा करती है। यूरो बनाम डॉलर की जोड़ी रात भर 1.1359 से 1.1387 के दायरे में कारोबार करती रही और यह लगातार तीसरी साप्ताहिक गिरावट की ओर बढ़ रही थी। 1.1356 पर स्थित सौ सप्ताह की मूविंग एवरेज इस समय सबसे महत्वपूर्ण समर्थन स्तर है और अगर यह टूट जाता है तो बिकवाली तेज हो सकती है। सोसाइटी जनरल और कॉमर्जबैंक जैसे बड़े बैंकों का मानना है कि फेडरल रिजर्व की विश्वसनीयता बहुत हद तक बहाल हो चुकी है और कॉमर्जबैंक ने वर्ष के अंत तक अपना यूरो बनाम डॉलर अनुमान 1.17 से घटाकर 1.15 कर दिया है। यह संशोधन बताता है कि पेशेवर बाजार भी अब डॉलर के पक्ष में दांव लगा रहा है, न कि यूरो के।
गौर करने वाली बात यह है कि जर्मनी के उपभोक्ता माहौल में भी कमजोरी दिखी है। अक्टूबर के लिए जीएफके उपभोक्ता जलवायु सूचकांक -30.6 पर आ गया, जबकि अपेक्षा -27.4 की थी और पिछला आंकड़ा -26.6 से संशोधित होकर -26.8 हो गया था। इस गिरावट की मुख्य वजह ऊर्जा की बढ़ी हुई लागत है, जो यूरोपीय उपभोक्ता की क्रय शक्ति को कमजोर कर रही है। जब यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के उपभोक्ता ही सतर्क हो जाएं तो यूरो को सहारा मिलना मुश्किल हो जाता है।
डॉलर की इस मजबूती का एक और पहलू यह है कि यह उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव डालती है। भारत जैसे देश जो आयातित कच्चे तेल और डीजल पर निर्भर हैं, उनके लिए डॉलर की मजबूती आयात बिल बढ़ा देती है। जब एक ही बैरल तेल के लिए अधिक रुपये देने पड़ते हैं तो यह घरेलू मुद्रास्फीति में सीधे जुड़ जाता है और फिर भारतीय रिजर्व बैंक के सामने एक कठिन चुनौती खड़ी हो जाती है कि वह विकास को सहारा दे या महंगाई पर अंकुश लगाए। इसी द्वंद्व की वजह से उभरते बाजारों की मुद्राएं और उनके बॉन्ड बाजार इस समय सबसे अधिक देखे जाने वाले बाजार बने हुए हैं।
निकट अवधि में निवेशकों की नजर अक्टूबर में होने वाली फेडरल रिजर्व की बैठक पर टिकी है, क्योंकि इस समय बाजार 25 आधार अंक की एक और बढ़ोतरी को लेकर पर्याप्त संभावना तय कर रहा है। अगर अमेरिकी आंकड़े मजबूत बने रहते हैं और महंगाई में नरमी नहीं दिखती तो डॉलर और यील्ड दोनों को और बल मिल सकता है। अगली चार्ट बाधा 5.25 से 5.30 प्रतिशत के बीच है और अगर यील्ड उसे पार कर जाती है तो वैश्विक बाजारों में एक नई बिकवाली की लहर आ सकती है। भारतीय निवेशकों के लिए सलाह यही है कि डॉलर इंडेक्स और अमेरिकी यील्ड को अपने पोर्टफोलियो की दिशा तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण संकेतकों में शामिल रखें।
कुल मिलाकर देखें तो इस समय डॉलर का बोलबाला है। मजबूत रोजगार, ठोस पूंजीगत निवेश, ऊंची ट्रेजरी यील्ड और फेडरल रिजर्व का सख्त रुख मिलकर एक ऐसा परिदृश्य बना रहे हैं जिसमें डॉलर को कमजोर होने की बजाय और मजबूत होने की अधिक गुंजाइश है। यही वजह है कि यूरो तीसरी साप्ताहिक गिरावट की ओर बढ़ रहा है और एशियाई मुद्राओं पर लगातार दबाव बना हुआ है। जब तक अमेरिकी केंद्रीय बैंक अपनी सख्त राह नहीं बदलता, तब तक उभरते बाजारों की मुद्राओं को राहत मिलने की संभावना कम ही दिखती है। यही इस समय वैश्विक मुद्रा बाजार की सबसे बुनियादी कहानी है और इसे समझना हर उस निवेशक के लिए आवश्यक है जो भारतीय या एशियाई संपत्तियों में पैसा लगाता है।