वैश्विक मुद्रा बाजार में आज एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिल रहा है। अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) लगातार कमजोरी दिखा रहा है और 98.70-98.75 के दायरे में सिमटा हुआ है, जो 99 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे बना हुआ है। सामान्य तौर पर डॉलर के कमजोर होने का सीधा फायदा उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को मिलना चाहिए, लेकिन भारतीय रुपये के लिए आज की तस्वीर उतनी सुखद नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण है कच्चे तेल की कीमतों में आया तेज उछाल।
ब्रेंट क्रूड फिर से $100 के ऊपर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड आज करीब 6 प्रतिशत की बढ़त के साथ 101.27 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है, जबकि WTI क्रूड 96.45 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है, यानी करीब 5.6 प्रतिशत की मजबूती। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति संबंधी आशंकाओं ने तेल की कीमतों में जोखिम प्रीमियम जोड़ दिया है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि हमारी करीब 85 प्रतिशत कच्चे तेल की मांग आयात से पूरी होती है। जब ब्रेंट 100 डॉलर के ऊपर जाता है, तो सीधे तौर पर देश का आयात बिल बढ़ता है, व्यापार घाटा चौड़ा होता है और चालू खाता घाटा (CAD) पर दबाव आता है।
रुपये पर दोहरा दबाव
आमतौर पर कमजोर डॉलर रुपये के लिए सहारा बनता है, लेकिन तेल की ऊंची कीमतें इस फायदे को लगभग निष्प्रभावी कर देती हैं। जब आयातक कंपनियां महंगा तेल खरीदने के लिए डॉलर की मांग करती हैं, तो रुपये पर गिरावट का दबाव बनता है। इसके साथ ही अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 4.84 प्रतिशत तक चढ़ गई है। ऊंची अमेरिकी ब्याज दरें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका ले जाने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यही कारण है कि डॉलर इंडेक्स के कमजोर होने के बावजूद भारतीय निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है।
महंगाई और आम आदमी की जेब
कच्चे तेल की कीमतें सीधे तौर पर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और परिवहन लागत से जुड़ी होती हैं। तेल महंगा होने पर माल ढुलाई महंगी होती है, जिसका असर हर वस्तु की कीमत पर पड़ता है। इससे थोक और खुदरा महंगाई दर ऊपर जा सकती है। अगर महंगाई बढ़ती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों को लेकर सतर्क रुख अपनाने का दबाव बन सकता है। ऐसे में उधारी महंगी हो सकती है, जिसका असर होम लोन, ऑटो लोन और कंपनियों की पूंजी लागत पर पड़ेगा। शेयर बाजार में तेल विपणन कंपनियों, विमानन कंपनियों और पेंट जैसे क्षेत्रों के मार्जिन पर दबाव बन सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए जोखिम प्रबंधन
ऐसे उथल-पुथल भरे माहौल में अनुशासित जोखिम प्रबंधन सबसे जरूरी है। पहला नियम यह है कि अपने पोर्टफोलियो का कोई भी एक हिस्सा तेल या मुद्रा संबंधी दांव में जरूरत से ज्यादा न लगाएं। दूसरा, स्टॉप-लॉस लगाना कभी न भूलें, क्योंकि भू-राजनीतिक खबरें अचानक बाजार को झटका दे सकती हैं। तीसरा, रुपये के जोखिम से बचने के लिए कुछ निवेश सोने या विदेशी संपत्तियों में रखें, जो मुद्रा गिरावट के समय सुरक्षा प्रदान करते हैं। चौथा, खबरों के आधार पर अचानक बड़े फैसले न लें, बल्कि धीरे-धीरे औसत लागत बनाएं। और सबसे महत्वपूर्ण, नकदी का एक हिस्सा हमेशा तैयार रखें ताकि बाजार में गिरावट आने पर आप खरीदारी का मौका भुनाने में सक्षम रहें। कुल मिलाकर, डॉलर की कमजोरी अकेला संकेत नहीं है; तेल, यील्ड और चालू खाता घाटा तीनों को एक साथ देखते हुए ही भारतीय निवेशक को अपनी रणनीति तय करनी चाहिए।