आज के वैश्विक बाजार में सोने ने अपनी चमक बरकरार रखते हुए स्पॉट बाजार में करीब 4,418 डॉलर प्रति औंस और कॉमेक्स पर 4,454 डॉलर प्रति औंस के स्तर को छुआ है। चांदी भी 67.66 डॉलर प्रति औंस के ऊपरी स्तर पर कारोबार कर रही है। भारत जैसे देश में जहां सोना केवल एक निवेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक जरूरत भी है, यह उछाल आम उपभोक्ता और निवेशक दोनों के लिए बहुत मायने रखता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी डॉलर इंडेक्स की कमजोरी। DXY लगातार 98.70 से 98.75 के बीच फंसा हुआ है और मनोवैज्ञानिक रूप से अहम 99 के स्तर को क्रॉस नहीं कर पा रहा है। जब डॉलर कमजोर होता है, तो सोने की कीमत आमतौर पर ऊपर जाती है, क्योंकि सोना डॉलर में ही उद्धृत होता है।
भारत में सोने की मांग बनी हुई है
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। शादी-विवाह का मौसम, त्योहार और दीर्घकालिक निवेश की सोच सोने की मांग को लगातार समर्थन देती है। अंतरराष्ट्रीय कीमत के साथ-साथ रुपये की चाल भी तय करती है कि घरेलू बाजार में सोना कितना महंगा पड़ेगा। यदि विदेशी बाजार में सोना ऊपर जाता है और साथ में रुपया भी कमजोर होता है, तो भारतीय ग्राहकों को दोहरा झटका लगता है। इसलिए सोने की कीमतों की गणना करते समय केवल अंतरराष्ट्रीय भाव नहीं, बल्कि रुपये-डॉलर विनिमय दर को भी ध्यान में रखना चाहिए। जो निवेशक भौतिक सोने, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड ईटीएफ या डिजिटल गोल्ड में निवेश करते हैं, उनके लिए यह समय अपनी औसत लागत और होल्डिंग अवधि की समीक्षा करने का है।
ऊंची ट्रेजरी यील्ड का असर
एक ओर डॉलर कमजोर है, तो दूसरी ओर अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड करीब 4.84 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह संयोजन असामान्य है, क्योंकि आमतौर पर ऊंची यील्ड डॉलर को मजबूत करती है। ऊंची यील्ड का मतलब है कि अमेरिका में सुरक्षित निवेश पर प्रतिफल बढ़ रहा है, जो जोखिम भरी संपत्तियों के मुकाबले अमेरिकी बॉन्ड को आकर्षक बनाता है। भारतीय निवेशकों के लिए इसका अर्थ है कि विदेशी निवेशकों की पूंजी अमेरिका की ओर खिंच सकती है, जिससे घरेलू शेयर बाजार और रुपये दोनों पर दबाव बन सकता है। ऐसी स्थिति में सोना एक बचाव विकल्प के रूप में उभरता है, लेकिन निवेशक को यह समझना चाहिए कि सोना भी कीमत में उतार-चढ़ाव दिखाता है और अल्पकालिक दांव के लिए यह जोखिम भरा हो सकता है।
क्रिप्टो बाजार में मामूली गिरावट
जहां सोना मजबूत बना हुआ है, वहीं क्रिप्टो बाजार में आज हल्की गिरावट देखी जा रही है। बिटकॉइन करीब 1 प्रतिशत गिरकर 78,000 डॉलर पर आ गया है, जबकि ईथरियम करीब 1.45 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,460 डॉलर पर कारोबार कर रहा है। यह गिरावट बताती है कि जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (रिस्क-ऑफ) बाजार में बनी हुई है। डॉलर कमजोर होने के बावजूद क्रिप्टो ऊपर नहीं चढ़ पा रहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि निवेशक इस समय सुरक्षित ठिकानों की ओर रुख कर रहे हैं। भारत में क्रिप्टो पर कर और नियमन को लेकर बनी अनिश्चितता भी घरेलू निवेशकों को सतर्क बनाती है।
विविधीकरण ही सही रास्ता
इस पूरे परिदृश्य से एक साफ सीख निकलती है कि किसी एक संपत्ति पर सारा दांव लगाना समझदारी नहीं है। सोना मुद्रा गिरावट और महंगाई के खिलाफ बीमा का काम करता है, लेकिन इसकी कीमत भी ऊंची हो चुकी है। शेयर बाजार में चुनिंदा क्षेत्रों में मौके मौजूद हैं, पर तेल और मुद्रा की अस्थिरता जोखिम बढ़ाती है। क्रिप्टो अधिक जोखिम लेने वालों के लिए सीमित हिस्सा ही होना चाहिए। भारतीय निवेशक के लिए सबसे व्यावहारिक तरीका यह है कि वह अपने पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा स्थिर और डिफेंसिव संपत्तियों में रखे, सोने को 10 से 15 प्रतिशत के दायरे में सीमित करे, और उच्च जोखिम वाले निवेशों में केवल वही पैसा लगाए जिसका नुकसान वह सह सकता हो। साथ ही, तेल, डॉलर इंडेक्स, ट्रेजरी यील्ड और रुपये की चाल पर लगातार नजर रखना आज के समय में हर सतर्क निवेशक की प्राथमिकता होनी चाहिए।